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आज की खास खबर | महाविपक्ष की एकजुटता कितनी सशक्त

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महाविपक्ष की एकजुटता कितनी सशक्त

पटना में विपक्षी पार्टियों की बैठक एक ऐसी शुरुआत है जो 2024 के आम चुनाव में बीजेपी के खिलाफ एक व्यापक गठबंधन का आधार बन सकती है. विपक्ष के विभिन्न नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और आत्मकेंद्रित क्षेत्रीय सोच की वजह से गठबंधन बना पाना इतना आसान भी नहीं है. विपक्षी पार्टियों में तभी तालमेल हो सकता है जब वे एक स्वीकार्य नेता के चयन, सीटों के बटवारे तथा समान न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत हों.

सार्थक प्रयासों के बावजूद कुछ अवरोध आ सकते हैं. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी को लेफ्ट पार्टियों से एलर्जी है. जहां अखिलेश है वहां मायावती आना नहीं चाहेंगी. कांग्रेस को देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का गर्व और केंद्र की सत्ता में लंबे समय तक रहने का अनुभव है. साथ ही फिलहाल उसकी 4 राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में सरकारे हैं. झारखंड की सरकार में उसकी साझेदारी है लोकसभा में बीजेपी के बाद सर्वाधिक 52 सीटें कांग्रेस की ही हैं.

भारत जोड़ो यात्रा के बाद से कांग्रेस का जनाधार बढ़ा है और कर्नाटक बीजेपी को पछाड़ने के बाद उसका हौसला ऊंचा हुआ है. इसलिए वह विपक्षी एकजुटता के ट्रेन में पीछे का डिब्बा नहीं बनेगी बल्कि इंजन बनना चाहेगी. ‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं. उनके प्लस पाइंट यह है कि दिल्ली और पंजाब में उनकी पार्टी की सरकारें हैं तथा उसने अल्प समय में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में सफलता पाई है.

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गठजोड़ की जरूरत क्यों

पहले भी विपक्षी पार्टियों के गठबंधन बनते-बिगड़ते देखते गए हैं. जनता पार्टी और जनता दल इसके उदाहरण हैं लेकिन घटक दलों के छितर जाने से इनकी सरकारें टिक नहीं पाईं. संयुक्त मोर्चा सरकार का भी यही हाल हुआ. विपक्षी एकता तभी मजबूत हो सकती है जब स्वार्थ त्याग कर सच्ची भावना से गठबंधन बनाया जाए. अभी विपक्षी गठबंधन की आवश्यकता इसलिए महसूस हो रही है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व में लोकसभा की 303 सीटों के साथ बीजेपी काफी सुदृढ़ स्थिति में है तथा विभिन्न राज्यों में उसकी सरकारें हैं. 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी में बीजेपी का वर्चस्व बना हुआ है. गुजरात तो उसका गढ़ है. मोदी लगातार 9 वर्षों से प्रधानमंत्री बने हुए हैं. विपक्षी गठबंधन एक संयुक्त प्लेटफार्म बनाना चाहता है जो बीजेपी से सधी हुई रणनीति के साथ मुकाबला कर सके.

आपसी सहमति का मुद्दा

विपक्षी पार्टियों की सहमति का प्रमुख मुद्दा यही रह सकता है कि बीजेपी को हराया जाए. इसके लिए बीजेपी प्रत्याशी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का एक ही उम्मीदवार खड़ा किया जाए ताकि वोट न बंटने पाएं. यदि विपक्ष को लोकसभा चुनाव में सफलता मिली तो नेता पद का फैसला बाद में भी हो सकता है. अभी से भावी प्रधानमंत्री के रूप में किसी नाम को सामने लाना अपरिपक्वता होगी और इससे एकता का सुर भी बिगड़ सकता है. निश्चित रूप से विपक्ष के कुछ नेताओं का राजनीतिक अनुभव काफी लंबा रहा है लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुराने दांवपेंच से काम नहीं चलने वाला. ‘धर्म निरपेक्षता विरुद्ध सांप्रदायिकता’ वाला पुराना फंडा आज किसी काम का नहीं रहा. कभी कांग्रेस का साथ देनेवाले मुस्लिम वोटों की दिशा क्या होगी? बीजेपी के साथ आरएसएस का कैडर रहता है और यह पार्टी हमेशा चुनावी तैयारी में लगी रहती है. इसलिए इसे चुनौती देना आसान नहीं होगा. बीजेपी ने हिंदू और ओबीसी वोटों को साध रखा है.

दूरी बरतनेवाली पार्टियां

बसपा नेता मायावती महाविपक्ष की बैठक से दूर रहीं. उन्होंने तंज कसा- ‘दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिए.’ राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी व बीजद के नवीन पटनायक भी इस अभियान में शामिल नहीं है. ममता, अखिलेश और केजरीवाल को राहुल गांधी नेतृत्व बिल्कुल नहीं चाहिए. ऐसे में क्या नीतीशकुमार को आगे लाने पर सहमति बन सकती है? कांग्रेस पहले भी विपक्षी गठबंधन को बाहर से समर्थन देती रही है लेकिन जहां उसने समर्थन वापस लिया सरकार गिरती देखी गई है.



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