वन विभाग का अनुभूति कार्यक्रम: युवाओं को ‘धरती के दूत’ बनाने का अनूठा अभियान…..

देवास, 30 दिसंबर, 2025: वन्यजीव अभयारण्य खिवनी, वन मंडल देवास के तत्वावधान में 29 एवं 30 दिसंबर को एक विशेष ‘अनुभूति कार्यक्रम’ का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्कूली बच्चों को प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के सान्निध्य से सीधे तौर पर जोड़कर उन्हें भविष्य के ‘धरती के दूत’ के रूप में तैयार करना था। इस वर्ष अनुभूति कार्यक्रम का नारा “हम धरती के दूत”,रहा । जो “में भी बाघ” ओर “हम है बदलाव” के साथ ‘प्रो प्लैनेट पीपल’ और ‘मिशन लाइफ’ के अगले चरण की भावना को दर्शाता है। जो संपोषणीय विकास और संवहनीय जीवनशैली का द्योतक है।
यह कार्यक्रम मध्य प्रदेश वन विभाग के फ्लैगशिप प्रोग्राम ‘अनुभूति’ के अंतर्गत आयोजित किया गया, जो एम.पी. इको-टूरिज्म, म.प्र. लघु वनोपज संघ तथा म.प्र. जैव विविधता बोर्ड का एक संयुक्त जागरूकता अभियान है। इस दो दिवसीय शिविर में पीएम श्री नवोदय विद्यालय चंद्रकेश्वर डैम देवास, शासकीय माध्यमिक विद्यालय नंदाखेड़ा एवं शासकीय माध्यमिक विद्यालय रिच्छीखोह के लगभग 265 से अधिक विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
इस वर्ष के कार्यक्रम में ‘जीरो प्लास्टिक’ के सिद्धांत का कड़ाई से पालन किया गया और पूर्णतः प्राकृतिक साधनों का उपयोग करते हुए अनुभूति के लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया गया। बच्चों को प्रसिद्ध ‘सप्तऋषि वृक्ष’, महुआ और बहेड़ा जैसे वृक्षों के नीचे ‘जंगल की पाठशाला’ में बैठाकर पर्यावरण एवं वन्यजीवों के बारे में रोचक एवं मजेदार जानकारियाँ प्रदान की गईं।
कार्यक्रम के दौरान बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए उन्हें बालगंगा मंदिर परिसर तथा गोली कोठी शिकारगाह के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं पुरातात्विक पहलुओं से भी अवगत कराया गया।
इस शैक्षिक भ्रमण के साथ-साथ बच्चों ने स्वादिष्ट देसी मालवी भोजन यथा दाल-बाटी व चूरमा लड्डू का आनंद भी लिया। कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों को वन विभाग की ‘अनुभूति कीट’ प्रदान की गई, जिसमें लघु वनोपज द्वारा तैयार आंवला कैंडी, शहद और हर्बल जूस शामिल थे। इस कीट के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी संलग्न था।
यह आयोजन युवा पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य बच्चों को ‘धरती के दूत’ के रूप में प्रशिक्षित करना है, ताकि वे न केवल स्वयं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहें, बल्कि अपने परिवार और समुदाय को भी इस महत्वपूर्ण मिशन से जोड़ सकें। ‘में भी बाघ’ और ‘हम है बदलाव’ जैसे नारों ने बच्चों में एक सकारात्मक पहल की भावना का संचार किया।




