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Rohini Vrat 2023 | आज है आषाढ़ का ‘रोहिणी व्रत’, हर महीने के इतने दिन पर होता है रोहिणी नक्षत्र, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और इसकी महिमा

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Rohini Vrat

File photo

सीमा कुमारी

नई दिल्ली: जैन समुदाय का मुख्य व्रत ‘रोहिणी व्रत’ (Rohini Vrat) हर महीनें में आता है। इस बार आषाढ़ महीने की रोहिणी व्रत आज यानी 17 जून,शनिवार को है। इस दिन जैन धर्म के अनुयायी भगवान वासुपूज्य स्वामी की पूजा-उपवास करते हैं। साथ ही उनके निमित्त व्रत उपवास भी रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि, रोहिणी व्रत करने से विवाहित महिलाओं को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही पति की आयु लंबी होती है। इस व्रत को करने से वट सावित्री व्रत के समतुल फल की प्राप्ति होती है। इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। जैन धर्म की विवाहित स्त्रियां रोहिणी व्रत जरूर करती हैं। अत: रोहिणी व्रत के दिन विधिवत भगवान वासुपूज्य स्वामी की पूजा करनी चाहिए। आइए जानें शुभ मुहर्त पूजा विधि और महत्व

शुभ मुहूर्त

रोहिणी व्रत, शनिवार, 17 जून 2023

रोहिणी व्रत प्रारंभ:

16 जून 2023 को दोपहर 3:21 बजे

रोहिणी व्रत समाप्त:

17 जून 2023 को शाम 4:10 बजे

पूजा विधि

रोहिणी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें। अब आचमन कर व्रत संकल्प लें और सूर्यदेव को जल का अर्घ्य दें। इसके पश्चात, भगवान वासुपूज्य स्वामी की पूजा फल, फूल, दूर्वा आदि से करें। व्रत कथा संपन्न कर आरती करें। इस समय आराध्य देव से सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करें। दिन भर उपवास रखें। शाम में सूर्यास्त से पहले आरती-आराधना कर फलाहार करें। अगले दिन सामान्य दिनों की तरह पूजा-पाठ संपन्न कर व्रत खोलें। इस समय गरीबों और जरूरतमंदों को दान अवश्य दें। आप अन्न और धन का दान कर सकते हैं।

महिमा

ज्योतिष-शास्त्रों की मानें तो 27 नक्षत्र हैं। अश्विन, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, घनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्र हैं। रोहिणी नक्षत्र हर महीने के 27 वें दिन पड़ता है। इस दिन रोहिणी व्रत मनाया जाता है। इस दिन परमपूज्य भगवान वासु स्वामी की पूजा-उपासना की जाती है। इस व्रत के पुण्य प्रताप से व्यक्ति को सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।



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